Thursday, 19 February 2015

लघु कथा - पाप क्या है?

लघु कथा - पाप  क्या है?
पुण्य क्या है और पाप क्या है? मैं तो इसे परिभाषित के योग्य नहीं हूँ |
कल की बात है | प्रात: भ्रमण के बाद पार्क में एक बैंच पर बैठा था | कुछ लोग और भी थे | अचानक ही पाप और पुण्य का प्रसंग चल पड़ा | ह्मारे साथ एक बुजुर्ग भी बैठे थे| उन्होंने जो कहानी सुनायी थी, वह आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ |
एक राजा था, उसकी कई रानियाँ थी, पुत्र थे और सुखी प्रजा थी | सब कुछ अच्छा चल रहा था | अचानक राजा के मान में यह जानने की इच्छा हुई कि पाप क्या है? राजा ने अपने दरबारियों के सामने अपना प्रश्न रखा लेकिन उसे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला | राजा को कोई भी विद्वान मिलता तो उससे यह जानने का प्रयास करता कि पाप क्या है? एक बार राजा जंगल में शिकार पर गया | वहाँ उसे एक संत मिले और राजा ने उनसे भी अपने प्रश्न का उत्तर जानना चाहा | उन्होने राजा से कहा,"पास में ही रूपवती का आश्रम है | राजन् आप वहाँ चले जाओ | आपको अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा|"
राजा रूपवती के आश्रम पहुँच गया| रूपवती बहुत ही सुंदर, गुणवान और विदुषी महिला थी|
राजा ने रूपवती के समक्षा अपना प्रश्न दुहराया,
"मैं यह जानना चाहता हूँ कि पाप क्या है?"
रूपवती ने कहा,"राजन्! आपको अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा लेकिन उसके लिए आपको 15-20 दिन आश्रम में रहना होगा|"
राजा ने कहा,"यह तो संभव नहीं है| मेरी रानियाँ हैं, पुत्र हैं, राज्य है| मैं इतने दिनों तक अपना सब कुछ छोड़कर आपके आश्रम में नहीं रुक सकता|"
रूपवती ने कहा,"राजन्! फिर तोआपको अपने प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाएगा|"
राजा ने अपने मान में विचार किया कि क्या पता मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाए| चलो कुछ दिन रुक ही जाता हूँ| राजा ने रूपवती से कहा,"ठीक है| मैं कुछ दिन रुक जाता हूँ|"
राजा आश्रम में ठहर गया| रूपवती राजा के लिए स्वादिष्ट व्यंजन बनाती| प्यार से खिलती| राजा की सेवा करती| दस-बारह दिन बीत गये| राजा को रूपवती से प्यार हो गया| राजा ने एक दिन रूपवती से कहा,
"मैं आपसे प्यार करता हूँ और शादी करना चाहता हूँ!"
रूपवती ने उत्तर दिया,"राजन्! जब आप मेरे आश्रम में आए थे तो आपको अपनी रानियों, पुत्रों और प्रजा की बहुत चिंता थी| यहाँ तक कि आप यहाँ रुकना भी नहीं चाहते थे| और अब आप सब कुछ भूल कर मुझसे शादी करना चाहते हो|"
"राजन्! यही पाप है| अपने कर्तव्य से विमुख होना ही पाप है| केवल चोरी करना, हिंसा करना, अत्याचार करना ही पाप नहीं है|"
राजा को अपनी ग़लती का आभाष हुआ| राजा ने रूपवती से क्षमा माँगी और अपने राज्य को चला गया|
अनेक बार हम कहते हैं कि हमने तो कोई पाप नहीं किया! पता नहीं भगवान कोनसे पाप की सज़ा हमें दे रहा है|
यह लघु कथा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपने कर्तव्य का सही प्रकार से पालन कर रहे हैं!
ह्म अवश्य सोचें कि एक इंसान, पुत्र, पति, पिता, नागरिक, कर्मचारी, व्यवसायी आदि, हम जो भी हैं उसके रूप में क्या अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं?
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धन्यवाद|

2 comments:

  1. आपका प्रयास सराहनीय है। कहानी शिक्षाप्रद है। अपने कर्तव्य के प्रति प्रेरित करने वाली है।

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    1. अपने कर्तव्य से विमुख होना ही पाप है

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